Friday, February 8, 2013

स्त्री आखिर एक जाति है
                  पूर्वा नरेश अपनी माँ विजय नरेश की के जन्म दिन पर ओके टाटा बॉय बॉय नामक नाटक  ले कर

   लखनऊ आयी .नाटक अपने कथ्य कहन और डिजाईन सभी रुपों में सशकत प्रदर्शन रहा .बंछाडा जाति की
 स्त्रियों के जीवन की documentry के निर्माण के माध्यम से पूर्वा स्त्री जीवन की बात करती  जाती है .पूजा और सीमाँ की बात हर बार शुरू होकर पूरी नहीं हो पाती है जबतक दोनों एक धरातल पर खड़ी नहीं हो जाती उनके सुख दुःख एक से ही निकले तब जुड़ता है उनका जीवन तंतु जो दोनों को साथसाथ खड़ा कर देता हैं .औरत की जिन्दगी की सच्चाई लगभग एक सी होती है .उनके दुःख सुख एक से ही होते है पूजा और सीमा दोनों के डायलाग बहुत सारी छुपाव दुराव के रस्ते आखिर उन्हें अपनीअपनी बात उजागर करती जाती है .तब दर्शक के सामने एक नई दुनिया खोलती जाती है .देह व्यापार करने वाली banchda जाति की रूपा महिला सशक्तिकरण
की कोई प्रवक्ता नहीं है लेकिन उसे अपनी देह या धंधे से कोई शर्म नहीं है उसके लोजिक उसे सही ठहराने के लिए काफी है लेकिन उसकी सोच हर औरत के दिल की बात कहती है .यानि ये आधुनिक लोपामुद्रा है जो स्त्री होने बावजूद देह की जरूरत  और अपनी मन की इच्हा को भी जानती है और उसे पूरा करने में भी नहीं झिझकती सीमा कहती है कि हर दिन एक ही आदमी से मन नहीं मिलता .वही उसकी सहेली रूपा उसे जरिया बनाकर michel के साथ भाग जाती है तब पूजा और सीमा भी अपनी राह खोजने निकल पड़ती है .कहानी सीमा को लेकर चलती है उसके बोल्ड्नेस बिंदास चरित्र को आगे ले चलने वाली धुरी पूजा बहुत सारे शेड्स लेकर चलती है .सीमा चकाचोंध करती है लेकिन बात कहलाना और उघारना और फिर उस मुद्दे पर अकेले चलना कारवां लेकर यही है ओके टाटा बॉय बॉय .

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