विश्वरूपम और वोट
रचनात्मकता और राजनीति की दुरभ्सन्धि हमेशा समाज के लिए खतरनाक रहा है ,किन्तु चंद वोटो के लिए फिल्म और किताबों पर प्रतिबन्ध लगाना या तो दिमागी दिवालियापन है या फिर साजिश .अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी लिखना या बोलना जितना गलत है उससे अधिक खतरनाक है सहनशीलता की कमी का .क्या कारण है कि देश का एक समुदाय लगातार असहनशील होता जा रहा है ,और हर बार सरकार
उनकी असहनशील ता को बढ़ावा देने के लिए के लिए हर स्तर तक उतर आती है .चाहे वह तसलीमा नसरीन को शरण देने की बात हो .या सलमान रशदी की किताब और शर्म की बात तो ये है की इस एक मुद्दे पर हर राजनीतिक दल की सोच और कारवाई एक ही होती है .जिसकी वजह से बहुस्यन्ख्क जनता अपने को असुरछित महसूस करने लगी है .शासन अगर वाकई धरमं निरपेछ तो सभी धमावालाम्बी प्रजा को एक ही तुला में रख कर ऐसे सवेदनशील मुद्दे पर निर्णय करना उचित होता ,किन्तु हर बार पछ पात पूर्ण निर्णय के कारण सेक्युलर जनता को साम्प्रदायिक बना रही है .चिंता की बात यह है कि यह बात सभी राजनीतिक दलों के कर्ता धर्ता अच्छी तरह से जानते है बस एक दूसरे से अधिक मुस्लिमपरस्त दिखाने की कोशिश ही देश को एकबार फिर से टूटने की कगार पर पहुंचा दे रही है।इसका फायदा मुस्लिम कट्टरपंथी लगातार उठा कर मुस्लिम भाइयों को भड़का रहें हैं ओवस्सि और बुखारी जैसों की हिम्मत और बडबोलापन बढता ही जा रहा है .हम पाकिस्तानियों से अधिक ओवॆसि बुखारी के साथ ही सरकार के असवेदंशील रवॆये से तकलीफ होती है .
रचनात्मकता और राजनीति की दुरभ्सन्धि हमेशा समाज के लिए खतरनाक रहा है ,किन्तु चंद वोटो के लिए फिल्म और किताबों पर प्रतिबन्ध लगाना या तो दिमागी दिवालियापन है या फिर साजिश .अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी लिखना या बोलना जितना गलत है उससे अधिक खतरनाक है सहनशीलता की कमी का .क्या कारण है कि देश का एक समुदाय लगातार असहनशील होता जा रहा है ,और हर बार सरकार
उनकी असहनशील ता को बढ़ावा देने के लिए के लिए हर स्तर तक उतर आती है .चाहे वह तसलीमा नसरीन को शरण देने की बात हो .या सलमान रशदी की किताब और शर्म की बात तो ये है की इस एक मुद्दे पर हर राजनीतिक दल की सोच और कारवाई एक ही होती है .जिसकी वजह से बहुस्यन्ख्क जनता अपने को असुरछित महसूस करने लगी है .शासन अगर वाकई धरमं निरपेछ तो सभी धमावालाम्बी प्रजा को एक ही तुला में रख कर ऐसे सवेदनशील मुद्दे पर निर्णय करना उचित होता ,किन्तु हर बार पछ पात पूर्ण निर्णय के कारण सेक्युलर जनता को साम्प्रदायिक बना रही है .चिंता की बात यह है कि यह बात सभी राजनीतिक दलों के कर्ता धर्ता अच्छी तरह से जानते है बस एक दूसरे से अधिक मुस्लिमपरस्त दिखाने की कोशिश ही देश को एकबार फिर से टूटने की कगार पर पहुंचा दे रही है।इसका फायदा मुस्लिम कट्टरपंथी लगातार उठा कर मुस्लिम भाइयों को भड़का रहें हैं ओवस्सि और बुखारी जैसों की हिम्मत और बडबोलापन बढता ही जा रहा है .हम पाकिस्तानियों से अधिक ओवॆसि बुखारी के साथ ही सरकार के असवेदंशील रवॆये से तकलीफ होती है .
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