Thursday, January 24, 2013

   हर नर चेहरे में छुपा है एक तालिबानी
  और सोच में बसी है कई खाप
  कितनी बार कितनी ही  सफाई से
  कही जाये कोई बात
 उजागर  हो ही जाती  है नस्ली सोच
 हर मादा  के लिए
 कैसे  भी कितनी ही तहों के  भीतर
 यानी  कि
 तुम  औरत  हो  औरत की तरह  रहो
बंद दरवाजो  खिडकियों और घूँघट  में
खुली हवा  सड़कें और नीला  आसमान
तुम्हारे  लिए नहीं है
कितनी बार कितनी भी जोर से कहे  कोई
तुम्हे रहना  है डर कर छिपकर मर्द की  छाह में
कोई आधी या पूरी दुनिया तुम्हारे लिए नहीं है
बस खिडकियों के पीछे से झांककर
सपने बुनती रहो इतना ही काफी है
वैसे ही जैसे जुबान कितनी भी चटखारे लेले
लेकिन दुबक कर रहती है बत्तीस के बीच
जरा भी इधर उधर हुई नहीं कि
काट ली  जाती है जुबान .
काट ली जाती है जुबान . 

1 comment:

  1. JAIHO SHYAMSUTA KI RAVAN JAISA BHAI PAANEY KAY BAAD BHI TALIBANI CHHEHRA DIKHAYI PAD RAHA HEIN TO HOGA HI KIYONKI TUMHARA SOCH GALAT NAHI HOGA AISA MERA VISWAS HEIN , VAISE AAURAT KI HALAT AAJ 21 SADI MEIN SIRF SAHRO MEIN THODI BAHUT THIK HEIN VARNA TO HAR OR NAR KAY ROOP MEIN BHEDCHHAL CHALNEY WALE LOG HI HEIN KOI SHINGH NAHI

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